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दक्षिण भारत में भूजल संकट पर एक दृष्टि-पात

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दक्षिण भारत में भूजल संकट पर एक दृष्टि-पात

छवि: ज्ञान शहाणे द्वारा

गत वर्ष , जून 2019 मे, चेन्नई के लोगों को एक  चिंताजनक स्थिति से निपटने के लिए  विवश होना पड़ा था - शहर के जलाशयों में पानी  कुल क्षमता  के 0.1% तक गिर गया था। भारत में विशेष रूप से दक्षिण में, अब पानी के उन्मादी ट्रकों, खाली बाल्टियों ,और उत्तेजित नागरिकों के दृश्य तेजी से आम हो गए हैं। 2019 की नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (NITI) नीति आयोग, भारत सरकार की रिपोर्ट दावा करती  है कि बैंगलोर, दिल्ली, वेल्लोर, चेन्नई और हैदराबाद सहित 21 भारतीय  शहरों में 2020 तक भूजल  की उपलब्धि समाप्त हो  जाएगी । इस संकट के कारण क्या हैं, और दक्षिण क्यों  विषमतापूर्वक प्रभावित हो रहा है ? भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे (IIT बॉम्बे) में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ता अखिलेश एस नायर और प्राध्यापक जे  इंदु ने हाल ही में एक अध्ययन में इन प्रश्नों के स्पष्टीकरण की पेशकश की है जहाँ वे बार-बार आने वाले सूखे के गंभीर परिणामों  पर बल देते हैं। यह अध्ययन इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रिमोट सेंसिंग में प्रकाशित किया गया था।

भूजल का गिरता स्तर न केवल जलयोजन जैसी आधार भूत आवकश्यताओं  अपितु खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था जैसी व्यापक चिंताओं को भी प्रभावित करता है। भारत जैसे कृषि गहन देश में, जो अपने आरक्षित भूजल भंडार का लगभग 90% सिंचाई के लिए उपयोग करता है, अनियमित वर्षा स्वरूप जैसे अन्य कारकों ने वर्तमान जल संकट को बढ़ाया है। शोधकर्ता लगातार सूखे के दौरान पानी की अनुपलब्धता  के कारण भूजल भंडार के अंधाधुंध दोहन की ओर इंगित करते हैं। पिछले अध्ययनों ने दक्षिण में भूजल संकट को गंभीर रूप से कम आंका गया था क्योंकि वे भूजल भंडारण में उतार-चढ़ाव दिखाने वाले ऐतिहासिक आंकड़ों (डेटासेट) पर विचार नहीं  कर पाए थे। गंभीर सूखे के बाद भूजल की बढ़ती मांग भूजल भंडारण में गिरावट की दर को बदल देती है।

“वर्तमान अध्ययनों की अधिकांश रिपोर्टें उत्तरी राज्यों में भूजल स्तर में तेजी से कमी को  दर्शाती  हैं जबकि दक्षिणी राज्यों में भूजल भण्डारण अपेक्षाकृत स्थिर था। तथापि, पिछले कुछ वर्षों में, दक्षिण भारतीय शहरों में जैसे कि बैंगलोर और चेन्नई ने भूजल की कमी की रिपोर्ट करना  प्रारम्भ कर दिया है’  प्राध्यापक जे इंदु कहती हैं। “इसने हमें पिछले अध्ययनों और वास्तविक जीवन स्थितियों में रिपोर्ट किए गए परिणामों के बीच असंगतता के संभावित कारण का पता लगाने के लिए  प्रेरित किया ,’’ उन्होंने  अपने   कथन में जोड़ा।


[बाएं से दाएं] अखिलेश एस नायर, आईआईटी बॉम्बे, डॉ जे श्रीकांत,सीएसआईआरओ ऑस्ट्रेलिया, और प्रोफेसर जे इंदु, आईआईटी बॉम्बे, जो इस काम में  जुटे हुए शोधकर्ता हैं।

शोधकर्ताओं ने नासा के उपग्रह से प्राप्त ग्रैविटी रिकवरी और क्लाइमेट एक्सपेरिमेंट  के भूजल आंकड़ों  (डेटा) के साथ-साथ लगभग 6000 कुओं के डेटा संग्रह जिसकी निगरानी केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) द्वारा 13 वर्षों (2003-2016) की अवधि में की गयी, का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि भू-जल स्तर में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने वाले अधिकांश काल 2009 से थे, और इसलिए, अपने विश्लेषण को दो  खंडकालों में विभाजित किया: 2009 से पूर्व और 2009 के पश्चात्।

शोधकर्ताओं ने पाया कि दक्षिण में 2009 के पहले के कालखंड में भूजल स्तर बढ़ रहा था लेकिन भूजल का स्तर 2009 के बाद के कालखंड में प्रति माह 0.25 सेंटीमीटर की बेहद चिंताजनक दर से घट रहा था । 2009 में भारत ने अपर्याप्त वर्षा के कारण सबसे खराब सूखे में से एक का अनुभव किया, जो औसत वार्षिक स्तरों से 23% कम था। इसके अतिरिक्त, दक्षिण भारत का प्रतिकूल भूविज्ञान ग्रेनाइट और बेसाल्ट जैसी कठोर चट्टानों से मिलकर बना है, जो वर्षा जल को सुगमता से रिसने की अनुमति नहीं देता है, उसने गिरते भूजल स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।

2009 के बाद, उतार-चढ़ाव वाले वर्षा के स्तर का भूजल भंडारण पर काफी प्रभाव पड़ा। इसके अतिरिक्त , चेन्नई जैसे प्रमुख शहरों का विस्तार, जिसमें जलाशयों के ऊपर आधारभूत संरचना का निर्माण किया गया, ने भूजल पुनर्भरण प्रक्रिया को कमजोर किया है। ये मानव निर्मित अवरोध जमीन में पानी के रिसाव को अवरुद्ध करते हैं, हानिकारक रोगाणुओं और रसायनों से भूजल के संदूषण के साथ बाढ़ का कारण बनते है।

भारत वर्षों से बहुभागी सूखे  से प्रभावित रहा है, और उनकी बारम्बारता समय के साथ लगातार  बढ़ती जा रही  है। नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की 40% से अधिक आबादी को 2030 आते आते पीने के पानी की सुविधा नहीं होगी, एक आंकड़ा जो दुनिया भर में भयावह स्थिति का संकेत दे रहा है, यह भी पूर्वानुमान करता है कि पानी की कमी कई छोटे और मध्यम स्तर के औद्योगिक और कृषि उद्यमों को संकट में डाल देगी। यह श्रमिक वर्ग जो बेरोज़गारी के खतरे को झेल रहा है, के सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के निम्न स्तर को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है - वैश्विक कार्यबल में 75% नौकरियाँ पानी पर बहुत अधिक निर्भर हैं।

भूजल स्तर को बनाए रखना और इसकी अवनति की दिशा को  पलटना भारत के  सामाजिक ,राजनीतिक, आर्थिक, औद्योगिक और कृषि स्थिरता के अभिन्न अंग हैं । अंतर-राज्य  जल विवाद, जैसे कावेरी मुद्दा, को फ़िलहाल शांत करना होगा ताकि अखिल भारतीय स्तर पर  जल संकट से निपटने के लिए समन्वित प्रयास  प्रारम्भ किये जा सकें ।प्रो जे इंदु कहती हैं "विशेष रूप से सिंचाई प्रयोजनों के लिए भूजल निष्कर्षण के लिए एक स्थायी दृष्टिकोण स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक पद्धति को अपनाना अनियत्रित दोहन को रोकने का तरीका है।"

“यह केवल जन जागरूकता के माध्यम से और भूजल के अवैध निष्कर्षण को नियंत्रित करके संबोधित किया जा सकता है।भूजल स्तर की अवनति को उलटने के लिए, कृत्रिम रिचार्ज कुओं और अन्य तकनीकों का उपयोग करके कृत्रिम भूजल पुनर्भरण के लिए मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में प्रचलित  विभिन्न तरीकों को अपनाया जा सकता है,” प्रोफेसर जे इंदु कहती हैं।

अध्ययन में कहा गया है कि ये राज्य अपने भूजल स्तर में धीरे - धीरे वृद्धि का अनुभव कर रहे हैं। “अगर ऐसी तकनीकों को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया जाता है, वे भारत के भूजल भंडारण में काफी  सीमा तक सुधार करेंगे।  वर्तमान में चल रहे हमारे प्रोजेक्ट के लिए, हम डॉ जे श्रीकांत के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जो राष्ट्रमंडल वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान संगठन (CSIRO) ऑस्ट्रेलिआ में एक वरिष्ठ वैज्ञानिक है,जो  भारत के लिए स्थायी भूजल भंडारण की स्थिति विकसित करने के लिए काम कर रहे हैं ,” वह अपनी बात समाप्त करते हुए कहती हैं।