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निकट भविष्य में अंकरूपण (डिजिटल) माध्यम से संभव होगा गंध का ज्ञान एवं संश्लेषण

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निकट भविष्य में अंकरूपण (डिजिटल) माध्यम से संभव होगा गंध का ज्ञान एवं संश्लेषण

गंध संसूचन (डिटेक्शन) हम किस प्रकार करते हैं? पारंपरिक जैविक अर्थ के अनुसार गंध अणु आंतरिक नासा कोशिका में स्थित एक अनुरूप ग्राही (मैचिंग रिसेप्टर) के साथ अर्गल के समान जुड़ता है (एक ताले में कुंजी के समान); यह प्रक्रिया कोशिका में आण्विक घटनाओं को प्रेरित कर नासिका तंत्रिका (न्यूरॉन्स) को उत्तेजित करती है। अंतत: ये स्नायु संकेत मस्तिष्क में पंहुचते हैं जहाँ इनका अर्थ लगाया जाता है। दूसरी ओर एक अपरंपरागत सिद्धान्त के अनुसार अणुओं के द्वारा गंध उत्पन्न होना इस बात पर निर्भर करता है कि अणुओं में अंतर्निहित परमाणु किस प्रकार कंपन करते हैं तथा उनका द्रव्यमान कैसे वितरित होता है।

औषधियों व खाद्य रसायनों की पहचान हेतु तथा सुरक्षा एवं प्रतिरक्षा के क्षेत्रों में गंध संसूचकों की व्यापक आवश्यकता है। यद्यपि गंध प्रक्रिया में सन्निहित भौतिकी को अब तक भली-भांति नहीं समझा गया है, एवं वर्तमान में गंध संसूचन के क्षेत्र में हम कई बार घ्राण क्षमता युक्त श्वान पर निर्भर होते है। उन्नत गंध संसूचक का निर्माण करने के लिए वैज्ञानिकों को आण्विक स्तर पर होने वाली उन भौतिक प्रक्रियाओं का ज्ञान होना आवश्यक है जो अणुओं में गंध उत्पन्न करती हैं। अत: गंध की भौतिक प्रक्रिया का ज्ञान एवं इसकी गणितीय प्रस्तुति, शोध का एक प्रभावशाली क्षेत्र है। मनोवांछित गंध गुणों से युक्त अणुओं का कृत्रिम संश्लेषण (सिंथेसिस) एक अन्य लाभ है जो हमें इस जानकारी से प्राप्त हो सकता है। यह लक्षित चिकित्सकीय गुणों (टार्गेटेड थेराप्यूटिक प्रॉपर्टी) के साथ औषधीय अणुओं के संश्लेषण के समतुल्य ही है।

विद्युत अभियांत्रिकी विभाग, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई (आईआईटी बॉम्बे) का एक शोध दल प्राध्यापक स्वरुप गांगुली के नेतृत्व में गंध भौतिकी की व्याख्या के निकट जा पहुँचा है। शोधकर्ताओं ने गंधाणुओं के आणविक व्यवहार के बोध के लिए क्वांटम जीव विज्ञान तकनीकों का उपयोग किया है। जहाँ स्थूल भौतिक सिद्धांत ऐसी प्रक्रियाओं की व्याख्या में विफल होते हैं, वहीं क्वांटम जीव विज्ञान एक नवीन उभरता क्षेत्र है, जो गंध जैसी जैविक घटना (गंधाणुओं में स्थित परमाणुओं का कंपन आदि) में उप-परमाण्विक प्रक्रियाओं को समझाने में वैज्ञानिकों की सहायता करता है। उनके प्रयोगों के परिणाम साइंटिफिक रिपोर्ट्स नामक शोधपत्रिका में प्रकाशित किये गए हैं।

आकार सिद्धांत (शेप थ्योरी) घ्राण चेतना का व्यापक रूप से मान्य सिद्धांत है, जिसके अनुसार गंधाणु नासा कोशिकाओं में ताले जैसी आकृतियों जैसे ग्राही अणुओं (रिसेप्टर मॉलिक्यूल्स) की उन सटीक कुंजियों के सामान हैं, जो आणविक अनुक्रमों को सक्रिय करती हैं। “यद्यपि 1996 में ट्युरिन एवं अन्य के प्रस्ताव के अनुसार गंध का ज्ञान इस बात पर निर्भर करता है कि गंधाणुओं में अंतर्निहित परमाणु किस प्रकार कंपन करते हैं। इसकी पुष्टि हेतु कुछ प्रायोगिक प्रमाण हैं जो बताते हैं कि गंध के ज्ञान में कंपन ऊर्जा की भूमिका होती है।” प्राध्यापक गांगुली कहते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार किसी पदार्थ के अणुओं में निहित कंपन ऊर्जा ही उस पदार्थ में गंध भरती है। वर्तमान अध्ययन, आकार सिद्धांत एवं कंपन सिद्धांत दोनों को परस्पर समाहित करने एवं उनके मध्य संबंध को जानने का प्रयास करता है।

शोध दल ने छह गंध-श्रेणियों से सम्बद्ध 20 अणुओं का अध्ययन किया - कस्तूरी, भुनी हुई काफी, फलस्वरस, लहसुन, सुगंधित यौगिक (बेंजीन) एवं कीटनाशक गोलियाँ। उन्होंने अणुओं को दो प्रकार से वर्गीकृत किया: 1) मानव विशेषज्ञों द्वारा अनुभूत गंध (उदाहरण स्वरूप फल-स्वरस या लहसुन की गंध); 2) आणविक कंपन आधारित गंध।

अणु के आकार की गणितीय स्वरूप में प्रस्तुति शोध दल की प्राथमिक चुनौती थी, जिससे गंध की उत्पत्ति के जटिल पक्ष की व्याख्या की जा सके। इसके लिए उन्होंने रासायनिक आरेखण (केमिकल ग्राफ) सिद्धांत का उपयोग किया। केमिकल ग्राफ निरूपण, बिन्दुओं (अणुओं में अन्तर्निहित परमाणु) का एक संजाल (नेटवर्क) होता है जो रेखाओं (परमाणुओं के मध्य स्थित रासायनिक बंध) के द्वारा जुड़ा होता है। इसे एक गेंद एवं कमानी (स्प्रिंग) संजाल की यांत्रिक युक्ति के रूप में देखा जा सकता है। रासायनिक बंध प्रत्येक परमाणु को एक कमानी (स्प्रिंग) सदृश बल के माध्यम से जोड़ता है। प्रत्येक कमानी के दोलन की अपनी कंपन आवृत्ति होती है एवं सामूहिक रूप से ये दोलन अणु में कंपन ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। इस आरेखीय निरूपण के उपयोग से शोध दल ने एक अणु के आकार एवं कंपन ऊर्जा के मध्य सम्बन्ध की व्याख्या की, जिसके परिणामस्वरूप गंध के आकार एवं कंपन सिद्धांतों को एकीकृत किया गया।

“गंधाणु का कंपन अभिलक्षण (वाइब्रेशनल कैरेक्टरायजेशन) एक वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) होता है (विभिन्न अवस्थाओं में कंपन से सम्बंधित ऊर्जा श्रृंखलायें)। यह अणुओं में अन्तर्निहित परमाणुओं की संख्या एवं निकटवर्ती परमाणुओं के साथ उनके बंध की स्थितियों (कमानी बल सदृश कर्शापकर्षण अर्थात पुश-पुल) पर निर्भर करता है। द्वि एवं त्रिआयामी निरूपण के लिए जटिलता में वृद्धि होती है,” अध्ययन की प्रथम लेखिका सुश्री निधि पाण्डेय कहती हैं। वह आगे कहती हैं कि उन्होंने कंपन वर्णक्रम के निरूपण का एक नवीन मार्ग व्युत्पन्न किया है जो कंपन ऊर्जा के साथ-साथ अवस्था (मोड) के प्रकार का भी ध्यान रखता है। अवस्था (मोड) एक अणु में स्थित परमाणु कंपनों की एक गतिशील आकृति (डायनामिक पैटर्न) है, जैसे कि रासायनिक बंध की लम्बाई में परिवर्तन (विस्तार); बंधों के मध्य कोण में परिवर्तन (नमन); परमाणु समूहों के मध्य कोण में परिवर्तन (रॉकिंग); तथा परमाणु समूहों एवं शेष अणु के मध्य समतलीय कोण में परिवर्तन (वैगिंग)।

आगे, शोधकर्ताओं ने समान कंपन वर्णक्रम वाले सभी अणुओं को समूहीकृत करने हेतु मानक यंत्राधिगम (मशीन लर्निंग) अल्गोरिदम का उपयोग किया, जिसके लिए ‘समानता’ के गणितीय माप का उपयोग किया गया। तत्पश्चात उन्होंने इस वर्गीकरण की तुलना गंध-अनुभूति आधारित समूहों से की।

“यंत्राधिगम के अभ्यास में अधिकाधिक भौतिकी-अंतर्दृष्टि लाने के उद्देश्य से हम साधारण कंपन ऊर्जाओं की तुलना के स्थान पर, कंपन अवस्था (वाइब्रेशन मोड्स) आधारित तुलना चाहते थे,” प्रा. गांगुली कहते हैं।
शोध दल ने पाया कि कंपन वर्णक्रम के आधार पर श्रेणीबद्ध किये गए अणु गंध-अनुभूति आधारित श्रेणी से मेल खाते थे।

अत: यह अध्ययन गणितीय साधनों का उपयोग करते हुए गंध का सटीक ज्ञान प्राप्त करने की संभावना को व्यक्त करता है, एवं गंध का अंकरूपण (डिजिटाइज़) करने का रोमांचक मार्ग प्रशस्त करता है - यह श्रव्य एवं दृश्य संकेतों (आडियो एंड वीडिओ सिग्नल्स) के समान ही है जो आज नियमित रूप से अनुभूत, संगृहित, प्रसारित एवं प्रतिकृतित (रीप्रोड्यूस) किये जाते हैं।