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भारतीय संस्कृति हेतु एक पोर्टल

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भारतीय संस्कृति हेतु एक पोर्टल

प्राचीन काल से भारत सम्मोहनी संस्कृति से समृद्ध देश के रूप में जाना जाता है, जो दूर-दूर से लोगों को आकर्षित करता है। भारत की विशाल धरोहर के दर्शन के लिए केवल एक जीवन पर्याप्त नहीं, क्योंकि इसे जानने एवं समझने के प्रयासों में हमेशा ही कुछ न कुछ शेष रह जाता है। भारत का भौगोलिक विस्तार एवं विविधता बहुधा भौतिक रूप से प्रत्येक स्थान पर जाने की हमारी क्षमता को सीमित करती है।  डिजिटल विकल्पों के आगमन ने वस्तुतः इस सीमा को पार करने एवं जन सामान्य को संस्कृति की इस निधि का सामीप्य प्रदान करने की संभावना को खोल दिया है। यह सांस्कृतिक कलाकृतियों  के एक सुनियोजित संग्रह के साथ देश को डिजिटल भविष्य की ओर अग्रसर करता है जिसका संरक्षण एवं अनुभव ऑनलाइन स्वरूप में किया जा सकता है। इसके डिजिटल अनुभव को सफल बनाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाते हुए, संस्कृति मंत्रालय (MoC), भारत सरकार ने भारतीय राष्ट्रीय आभासी पुस्तकालय (नेशनल वर्चुअल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया; NVLI) परियोजना प्रारम्भ की है। भारतीय संस्कृति पोर्टल एनवीएलआई परियोजना के एक भाग के रूप में विकसित किया गया है जो एकल गंतव्य लक्ष्य एवं सूचनाओं का कोष है।

एनवीएलआई परियोजना के माध्यम से, संस्कृति मंत्रालय ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई (आईआईटी बॉम्बे) की सहभागिता में धरोहर तथा संस्कृति के विभिन्न पक्षों की रक्षा करने, डिजिटाइज़ करने एवं समेकित करने का भागीरथ प्रयास किया है। कार्यदल ने भारत भर के संस्थानों से ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व का यह विपुल संग्रह प्राप्त किया है। कई वर्गों में विस्तारित यह संग्रह भारतीय संस्कृति पोर्टल के माध्यम से नि:शुल्क उपलब्ध कराया गया है। पोर्टल सभी के लिए विशेषकर इतिहास एवं सामाजिक विज्ञान जैसे विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे छात्रों तथा शोधकर्ताओं के लिए भारतीय संस्कृति का एक विशाल संसाधन है। वे कुछ दुर्लभ सूचनाओं तक अभिगमन कर सकते हैं, जो अन्यथा केवल संग्रहालयों या संस्थानों में कुछ भौतिक संपर्कों के माध्यम से ही उपलब्ध होती हैं। एनवीएलआई परियोजना के मंत्रणाकार प्रा. प्रदीप वर्मा कहते हैं, "ज्ञान एवं अभिगम का लोकतंत्रकरण पोर्टल के मुख्य शासी सिद्धांत हैं- सांस्कृतिक संसाधन तथा संस्कृति से जुड़ा वार्तालाप सभी के लिए सुलभ होना चाहिए"।

भारतीय संस्कृति पोर्टल का दिसंबर 2019 में डिजिटल रूप से शुभारम्भ किया गया था तथा यह एंड्रॉइड एवं आईओएस दोनों मंचों पर सरल एवं सुरक्षित ऐप के रूप में भी उपलब्ध है। यह एक ऐसा स्रोत है जो कभी भी, कहीं भी स्वतंत्र रूप से उपलब्ध है एवं यहाँ जाने के लिए उपयोगकर्ता को लॉग इन करने की आवश्यकता नहीं है। अग्रिम अन्वेषण, डिजिटल फ्लिप-बुक्स, सामाजिक प्रसार माध्यम पर सहभाजन (शेयरिंग) एवं  क्यूआर कोड सहभाजन जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। जानकारी पाठ्य, छायाचित्र, श्रव्य एवं चलचित्र के रूप में विद्यमान है।

इस पोर्टल पर कोई भी व्यक्ति दुर्लभ पुस्तकों एवं पांडुलिपियों, ऐतिहासिक अभिलेखागार, संग्रहालयों से सम्बंधित जानकारी तथा भारत के विभिन्न भागों से कला के विविध स्वरूपों, संगीत, वस्त्र एवं व्यंजनों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त कर सकता है। साइट में ऐतिहासिक स्मारकों, दुर्गों एवं नगरों के सम्बन्ध में लेख हैं। इसमें श्रुति परंपराओं एवं पारंपरिक शिल्प कौशल की जानकारी से युक्त हमारी अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर को समर्पित एक वर्ग भी विद्यमान है। एक कार्यदल जानकारी एवं वर्गों को नियमित रूप से अद्यतन (अपडेट) करता रहता है।

भारतीय संस्कृति के अन्वेषण को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर, परियोजना के नेतृत्वकर्ता प्रा. कन्नन मौद्गल्य कहते हैं, "भारत सदैव संस्कृति सम्पन्न देश रहा है। भारत के प्रायः प्रत्येक नगर एवं गाँव में रोचक विषय जैसे स्मारक, मंदिर एवं अद्भुत कथाएँ हैं। यहाँ इस धरोहर को प्रकाशित होने का अवसर है।" वह बताते हैं कि "ऐसे कई प्राचीन मंदिर हैं जो अभियांत्रिकी के चमत्कार हैं, अतएव यहाँ ऐतिहासिक विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के विविध उदाहरण हैं जिन्हें विश्व पटल पर लाया जाना है।"

वेबसाइट में शोध पत्रों, पांडुलिपियों एवं योगदान करने वाले संगठनों से प्रत्यक्ष रूप में प्राप्त कला-शिल्प के छायाचित्रों जैसी संदर्भ सामग्री को डिजिटाइज़ किया गया है। कार्यदल ने दुर्लभ पुस्तकों एवं अभिलेखीय प्रपत्रों का उपयोग करके छायाचित्र निबंधन, प्रसिद्ध स्थानों के आभासी विहार (टूर), कथाओं तथा लघुतथ्यों (स्निपेट) जैसी सामग्री भी निर्मित की है। निर्मित कथाएँ भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार के अभिलेखों पर आधारित हैं, जो अभिलेखागार साक्ष्य के साथ परस्पर संबन्धित है, जहां तक पाठक भी पहुँच सकते हैं। उदाहरण के लिए, "कोहिनूर" हीरे में ऐतिहासिक साक्ष्य के संकेत एवं संबंधित पांडुलिपियों के लिंक सम्मिलित हैं। “लघुतथ्य” भारतीय संस्कृति तथा इतिहास के विभिन्न पक्षों के संक्षिप्त रूप हैं।

दुर्लभ पुस्तकों के प्रभाग में वे पुस्तकें भी सम्मिलित हैं जो 14 वीं शताब्दी की हैं। ये पुस्तकें कई विषयों जैसे इतिहास से लेकर साहित्य, पाक कला, वनस्पति विज्ञान एवं वास्तुकला पर आधारित हैं। उपयोगकर्ता इस प्रभाग से दुर्लभ पुस्तकों का अवचयन (डाउनलोड) कर सकते हैं।

स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगांठ के सुसंयोग पर, पोर्टल ने "स्वतंत्रता अभिलेखागार" प्रभाग भी आरंभ किया। इस में छायाचित्रों का संग्रह, दुर्लभ पुस्तकें, पुराने समाचार पत्रों की कतरनें एवं भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर प्रभाव डालने वाले नायकों एवं स्थानों पर भी एक प्रभाग है। इसमें स्वतंत्रता आंदोलन के अचर्चित नायकों पर भी एक प्रभाग है। "क्या आप जानते हैं?" अनुभाग के अंतर्गत प्रसिद्ध व्यक्तित्वों एवं इतिहास के बारे में रोचक तथ्य भी प्रस्तुत किए गए हैं एवं इस अनुभाग को प्रतिदिन अद्यतन किया जाता है।

आईआईटी मुंबई के इस कार्यदल में लगभग 50 सदस्य हैं, जिनमें विषय विशेषज्ञ एवं वेबसाइट विकास तथा प्रबंधन दल सम्मिलित हैं। रचनाकारों ने संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत संग्रहालयों एवं संस्थानों जैसे भारत भर के संगठनों में स्थित विभिन्न कोषों से जानकारी एकत्र की। विभिन्न संगठनों से डिजिटल अभिलेखों को प्राप्त करना महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक है, क्योंकि अनेकों अभिलेख भौतिक रूप में ही उपलब्ध हैं। डिजिटल अभिलेखों को इससे संबद्ध सटीक मेटाडेटा की आवश्यकता होती है जो डिजिटल आँकड़ों के विवरण एवं महत्व का वर्णन करता हो । यह मेटाडेटा अधिकांशत: स्रोत संस्थानों से आता है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) ने भी प्रारम्भ में सामग्री से सम्बद्ध मेटाडेटा के संरक्षण कार्य में भूमिका निभाई है।

डिजिटल अभिलेख एवं विस्तृत मेटाडेटा को एक ही कोष में समेकित करने की प्रक्रिया में पोर्टल को समय लग सकता है। अत: संपूर्ण सामग्री मेटाडेटा के आधार पर संरक्षित, व्यवस्थित एवं टीकाकृत की जाती है। इतिहास, संस्कृति तथा भारतीय धरोहर आदि पर विषय-विशेषज्ञों का पोर्टल कार्यदल सामग्री के उपरोपण (अपलोड) एवं जनता के लिए उपलब्ध कराने से पूर्व इसे सत्यापित करते है। 

भारतीय संस्कृति पोर्टल का सूत्रधार (होस्ट) आईआईटी मुंबई का जाल-वितरक (सर्वर) है। इस जाल-वितरक में 3 पेटाबाइट (एक मिलियन गीगाबाइट) डेटा रखने की क्षमता है। अभी तक इसके द्वारा लगभग 0.8 पेटाबाइट स्थान ही उपभोग किया गया है। "हमने डेटा रखने के लिए एक बड़ा क्लाउड स्थापित किया है। विस्तारित डेटाबेस को समायोजित करने के लिए यह कुछ और समय के लिए पर्याप्त है, " प्रा. मौद्गल्य सूचित करते हैं। अब तक, 224 देशों के 20 लाख से अधिक आगंतुक वेबसाइट पर आ चुके हैं, यद्यपि इनमें से अधिकांश भारत से हैं।

आगे चलकर कार्यदल का प्रयोजन विभिन्न वर्गों के अंतर्गत अधिक संरक्षित की गई सामग्री को सम्मिलित करने, उपयोगकर्ता अनुभव को बढ़ाने एवं कई वर्गों के अंदर उन्नत पथ प्रदर्शन (नेविगेशन) तथा अंतर-संबंधों को सक्षम करने का है। पारस्परिक  इंटरफेस एवं नए प्रभागों को जोड़ना भी इसमें सम्मिलित है। वर्तमान में, पोर्टल अंग्रेजी तथा हिंदी भाषा में उपलब्ध है। जैसे ही कार्यदल आवश्यक विशेषज्ञता को सम्मिलित करने के लिए विस्तार करता है, वे इस मंच को कई भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराना चाहेंगे ताकि अधिक से अधिक उपयोगकर्ता इसका अनुभव प्राप्त कर सकें। साइट के लिए एक पाठ्य से ध्वनि (टेक्स्ट-टू-वॉयस) रीडर भी विकसित किया जा रहा है।

प्रा. मौद्गल्य इस बात से पूर्णतः सहमत हैं कि इस पोर्टल को लोकप्रिय बनाये जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि युवाओं को भारतीय संस्कृति एवं इतिहास में अध्ययन करने के लिए जागरूक तथा प्रेरित किए जाने की आवश्यकता है। कार्यदल का उद्देश्य व्यापक पहुँच वाले (आउटरीच) कार्यक्रम करना है एवं इसके निमित्त सक्रिय रूप से सामाजिक प्रसार माध्यमों एवं आउटरीच निपुण लोगों की खोज चल रही है जो इस परियोजना का विस्तार कर इसे और प्रभावशाली बना सकें।