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समुद्री अक्षय ऊर्जा के संभावित दोहन का आकलन

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अध्ययन का उद्देश्य भारत के तटीय क्षेत्रों में तरंग ऊर्जा संयंत्रों हेतु संभावित स्थानों की पहचान करना है।

छायाचित्र श्रेय पिक्साबे 

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई के शोधकर्ताओं ने तरंग ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की रणनीति एवं स्थलों के चयन के संबंध में सूचना प्रदान करने हेतु भारत के तटीय क्षेत्रों के तरंग आंकड़ों का विश्लेषण किया। उन्होंने चार दशकों तक ऋतुओं एवं स्थानों के साथ तरंग शक्ति में होने वाले परिवर्तनों को समझा। इस हेतु उन्होंने लक्षद्वीप तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूहों एवं भारत के मुख्य भू-भाग के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों (समुद्र का वह क्षेत्र जिस में एक राष्ट्रीय राज्य का समुद्री संसाधनों पर अधिकार है) में तरंग आंकड़ों का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने इससे संबन्धित विवरण शोध पत्रिका रीजनल स्टडीज़ इन मैरिन साइंस  में प्रकाशित किया है।

जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन का संकट बढ़ता जा रहा है अक्षय ऊर्जा स्रोतों  के उपयोग में वृद्धि करना आवश्यक हो गया है। यद्यपि ऊर्जा के समस्त अक्षय स्रोतों की क्षमता समान रूप से नहीं खोजी गई है। पनबिजली परियोजनाएं वैश्विक विद्युत उत्पादन का 16.6 %  एवं अक्षय स्रोतों से उत्पन्न  विद्युत शक्ति का 70% भाग हैं। पवन एवं सौर ऊर्जा संयंत्र भी उत्तरोत्तर बढ़ रहे हैं। प्रचुर उपलब्धता होने पर भी, समुद्र तटों से प्राप्त ऊर्जा की खोज अन्य अक्षय स्रोतों में अल्पतम प्रतीत होती है।  

भारत जैसे देशों में, समुद्री तट पर तरंग ऊर्जा के प्रयोग से उत्पन्न की जा सकने वाली शक्ति का संतोषजनक आकलन उपलब्ध नहीं हैं। ऐसा मुख्यत: ऊर्जा संसाधनों पर स्व-स्थान (इन-सिटु) आंकड़ा संग्रह की वास्तविक चुनौतियों के कारण है। "विशाल तटीय लंबाई, परिवर्तनीय गतिकी, भूगोल, ऋतुओं  एवं स्थानों की विविधता के साथ तरंगों के विविध विन्यास एवं अभिलक्षण, कार्यस्थल पर मापन असुविधा तथा पर्यावरणीय प्रभावों के आकलन में कठिनाई आदि कुछ ऐसे कारक हैं जो ऊर्जा क्षमता के निर्धारण को कठिन बनाते हैं," अध्ययन के अग्रणी, आईआईटी मुंबई के प्राध्यापक बालाजी रामाकृष्णन कहते हैं।  

शोध छात्र अंकित मिश्रा एवं सथीशकुमार जयराज, तथा एक भूतपूर्व ग्रीष्मकालीन  प्रशिक्षु आर. हरिप्रिया ने आईआईटी मुंबई के जनपद अभियांत्रिकी विभाग में प्राध्यापक बालाजी रामाकृष्णन के मार्गदर्शन में वर्तमान अध्ययन किया। प्रा. बालाजी के नेतृत्व में यह प्रयोगशाला तरंगों, ज्वार एवं प्रवाह जैसे समुद्री अक्षय ऊर्जा स्रोतों पर लगभग एक दशक से कार्यरत है।    

तरंग ऊर्जा को पॉइंट अब्सॉर्बर ब्वाय जैसे प्लवमान (फ्लोटिंग) यंत्र अथवा स्थापित यंत्र जैसे टरबाइन के प्रयोग से विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है। किसी भी प्रकार के यंत्र के लिए, आने वाली किसी तरंग से इनके द्वारा उत्पन्न ऊर्जा, उस तरंग की ऊंचाई (तकनीकी रूप से सार्थक तरंग ऊंचाई कहते हैं) एवं इसके समय काल (वह समय जो एक तरंग, एक बिन्दु को पार करने में लेती है) के समानुपातिक होती है।  शोधकर्ताओं के लिए इन मापदंडों का अनुमान लगाना आवश्यक है ,ताकि तरंग शक्ति उपलब्धता की गणना की जा सके ।

प्रा. बालाजी के दल ने भारतीय तट-रेखाओं के 39 वर्षों के तरंग आँकड़ों का उपयोग किया, जो उन्हें ईसीएमडब्ल्यूएफ (यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्ट) के द्वारा उपलब्ध कराया गया था। उन्होंने विविध स्थानों एवं जलवायु स्थितियों के लिए सार्थक तरंग ऊँचाई एवं तरंग शक्ति में होने वाले परिवर्तन को समझने हेतु आँकड़ों का विश्लेषण किया। इन मापदण्डों में होने वाले परिवर्तन की समझ, विद्युत उत्पादन  में होने वाले उतार-चढ़ाव को कम करने में सहायता कर सकती है। इसी के साथ कम विविधता वाले स्थान के चयन से  एक स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित हो सकती  है। "इसके अतिरिक्त, यह भी देखा गया है कि प्रमाणित ऊर्जा निष्कर्षण प्रौद्योगिकी में से अधिकांश, तरंग शक्ति एवं सार्थक तरंग ऊंचाई की एक निश्चित सीमा से परे बेहतर प्रदर्शन करती हैं।" उपयुक्त  प्रौद्योगिकी एवं  इसके स्थापना स्थल के चयन हेतु इन मापदंडों को समझने के महत्व पर बल देते  हुए  प्रा. बालाजी आगे बताते  हैं।    

समुद्र गतिकी के गणितीय प्रतिरूपण (मैथामेटिकल मॉडलिंग सिमुलेशन) एवं दशकों में एकत्रित किए गए तरंग आँकड़ों के व्यापक विश्लेषण के माध्यम से, कार्यदल ने उन स्थलों को पहचानने का प्रयास किया जहाँ तरंग ऊर्जा संयंत्र संभावित रूप से स्थापित किए जा सकते हैं। उन्होंने इस समुद्री गतिकी की ऋतुनिष्ट विविधता का भी आकलन किया जो नीतिगत निर्णय लेने के लिए महत्वपूर्ण है।

अध्ययन ने दिखाया कि उच्च स्तरीय तरंग शक्ति एवं न्यूनतम विविधता के साथ भारतीय मुख्य भूभाग का दक्षिणी सिरा, तरंग ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के लिए सर्वाधिक रूप से उपयुक्त है। भारतीय तट रेखाओं के अधिकांश क्षेत्रों में तरंग शक्ति की उपलब्धता अत्याधिक रूप से ऋतुनिष्ट  है, जो कि वृष्टिकाल में अधिकतम होती है। चूंकि वृष्टि रहित महीनों में सौर ऊर्जा प्रचुरता में होती है, अतः यह अध्ययन प्रस्तावित करता है कि संगत ऋतुओं में सौर एवं पवन शक्ति को संयोजित करने की रणनीति समस्त देश में चिरकालिक ऊर्जा की सतत आपूर्ति को सुनिश्चित कर सकती है। 

यह अध्ययन लक्षद्वीप तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप-समूहों की तट रेखाओं से लगे हुए महत्वपूर्ण तरंग शक्ति परिमाण से युक्त स्थलों को भी चिन्हित करता है, जो संभवतः इन पृथक्कृत एकाकी द्वीपों की स्थानीय ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपयोग किये जा सकते हैं। ईंधन आपूर्ति के लिए वर्तमान में ये द्वीप मुख्य भू भाग पर निर्भर होने के कारण बिजली की गंभीर कमी से जूझ रहे हैं। चिरकालिक एवं संभवतः कम मूल्य वाली तरंग शक्ति का मार्ग, मुख्य भूमि पर द्वीपों की निर्भरता को कम कर सकता है तथा जीवन स्तर के सुधार में योगदान दे सकता है।

"अंडमान एवं लक्षद्वीप में बसे हुये अधिकांश द्वीप, जीवाश्म ईंधन आधारित विद्युत उत्पादन पर आश्रित हैं। चूँकि द्वीप अलग-थलग एवं बिखरे हुए  हैं, अत: इनको पावर-ग्रिड के साथ जोड़ना चुनौतीपूर्ण होने के साथ साथ आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है," प्रा. बालाजी कहते हैं। उनके समूह का कार्य संभावित रूप से इन एकाकी द्वीपों के समीप समुद्री अक्षय ऊर्जा संसाधनों को चिन्हित करने एवं न्यूनतम बिजली आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु उपयुक्त  तकनीकों के चयन में सहायक हो सकता है।

आईआईटी मुंबई के इस अध्ययन से प्राप्त ज्ञान, भविष्य में बिजली संयंत्रों के संभावित स्थलों को इंगित करने वाले अध्ययनों पर दिये जाने वाले ध्यान को सीमित करने में सहायक हो सकता है।  तरंग ऊर्जा सामर्थ्य का मूल्यांकन एक वृहद मापदंड पर बिजली संयंत्र स्थापित करने की दिशा में एक आवश्यक प्रथम चरण  है। प्रा. बालाजी के अनुसार उपलब्ध समुद्री ऊर्जा का अधिक विस्तृत आकलन,  व्यवहार्य एवं इष्टतम प्रौद्योगिकी का अन्वेषण, भारतीय-परिस्थिति-विशेष उपकरणों का नवाचार, मूल्य आकलन हेतु आंकड़ा संग्रह एवं संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का गहन विश्लेषण आदि तरंग ऊर्जा के सामर्थ्य को साकार करने की इस यात्रा की दिशा में तात्कालिक रूप से आवश्यक कदम हैं।